शुक्रवार, दिसंबर 30, 2011

''हम''

ख्यालों के घनेरे कोहरों में खोये हुए 

मैं और तुम..




रेत पर बूँद के निशां ढूंढ़ते 

प्यासे भटकते मुसाफिरों की तरह,


जब मिल जाते हैं उस ठिकाने पर ....




जहाँ ..

खत्म हो जाते हैं 
ज़माने के सारे गम..


जिंदगानी लगने लगती है
कमतर से भी कम.... 




तब..

खुद को खोकर

मैं और तुम..


कहलाने लग जाते हैं.

''हम''  ..

 

बुधवार, दिसंबर 28, 2011

खुशियों का बैंक

जीवन के बाज़ार में ,

खुशियों का एक बैंक बनायें.....



ग़मों  को बना दें, मेनेजर और कर्मचारी,

और उनसे हीं, खुशियों की रखवाली कराएँ..




जिन्हें मिले खुशियाँ बेहिसाब,

वो थोडा, खाते में जमा करा आयें...


जब हो कोई दुखी,

तो बैंक से लोन पाए,

और आसन किस्तों में वापस चुकाए...


सोचो..

गर ऐसा हो ...

तो,,

खुशियाँ ही, जीवन ना बन जाएँ....



शुक्रवार, दिसंबर 23, 2011

सिर्फ तुम्हारे लिए..

मेरी  मोहब्बत का बीज..
जो,आज मैंने अनजाने  तेरे जेहन में बोया..

जुदाई के अश्कों से..
रोज़ सींचना इसको..


फिर एक दिन ..

अंकुर फूटेगा इसमें.
मेरी मोहब्बत का अंकुर..


जितनी शिद्दत से याद करोगी मुझे,
पौधा उतनी तेज़ी से बढेगा...

ज़ज्बातों की अनगिनत टहनियां फूटेंगी इसमें..

जिनमे,,ख्वाबों की छोटी छोटी सुनहरी पत्तियां लगेंगी ..
हाँ,,,,,,
सुनहरी पत्तियां...

जो,,,अधूरे अरमानो की धूप में अभ्र सी चमक उठेंगी...





एक दिन ..
आवारा बादलों सा ,..भटकता आऊंगा..,

आंधी उठेगी...

जब तरसता हुआ पाउँगा तुझे...



पहरों बरसता रहूँगा...

भींगती रहेगी तू....
'''''''''''''
''''''''''''
''''''''''''
बस.....भींगती रहेगी......

बुधवार, दिसंबर 21, 2011

मैं

एक जूनून हूँ...

गुजर जाऊंगा, 
दिलों को छूकर ऐसे..

काफ़िर हवा बदन को सहलाकर,
ग़ुम हो जाती है जैसे..


मेरे जाने के बाद,

मेरे निशाँ,,
ढूंढ़ओगे जमीं पर,

पर नज़र ना आऊंगा,.

खो जाऊंगा ऐसे,

पलकों से ढूलके मोती,
पल में,
 ग़ुम हो जाते हैं जैसे....  

मंगलवार, दिसंबर 20, 2011

वक़्त की बिसात

पल दो पल का साथ है,
जी भर के,,जी ले ज़िन्दगी 

 वक़्त की क्या बिसात है..
ना जाने कोई...


अभी हम साथ हैं.,

शायद.,कल बिछुड़ना होगा.

परिंदों की तरह,
घोसलों को बदलना होगा..

वक़्त की शह पर,
मोहरों को संभलना होगा,,

शायद.....

फिर कभी ना मिलेंगे ,

हम जुदा हो के....


पल दो पल का साथ है,
जी भर के,,जी ले जिंदगी..

 वक़्त की क्या बिसात है.....
ना जाने कोई...

रविवार, दिसंबर 18, 2011

अभी दूर है..


ऐ हमसफ़र, 
चल दिए कहाँ ?
छोड़ के बीच सफ़र में...

अभी दूर है..
बसने चले थे हम,
जिस शहर में...

शायद, रेत की चादरों पर सजाये थे हमने सपने...
जिसे, वक़्त की आंधी ने उड़ा दिया...
राह में भटकते मुसाफिरों की तरह
तुने मुझे भुला दिया..

अकेले  भटकते हैं अब,
अनजाने अंधेरे डगर में..

ऐ हमसफ़र, 
चल दिए कहाँ ?
छोड़ के बीच सफ़र में...



तुझे खोकर,
खुद को ऐसे भुला दिया..
जैसे सीप से किसी ने
मोती चुरा लिया..

ऐसी क्या ख़ता हुई मुझसे,
बता,
क्यों बीच सफ़र में
 तुने दामन छुड़ा लिया???

अपनी ही लाश ढोते है..
अपने कन्धों पर अब..
इस वीराने , अजनबी शहर में..

ऐ हमसफ़र, 
चल दिए कहाँ ?
छोड़ के बीच सफ़र में...


अभी दूर है..
बसने चले थे हम,
जिस शहर में...

गुरुवार, दिसंबर 08, 2011

'' मैं खुश हूँ ''

ज़िंदग़ी थमी सी है..
ज़ज्बातों में कोई कमी सी है..
आँखों में जाने कैसी नमी सी है..

मगर मैं खुश हूँ....

अपनों ने मुँह मोड़ा है..
जिसने वादा किया साथ देने का
उसने बीच भंवर में छोड़ा है..
दिल के टुकड़े ने,
टुकड़ों में दिल को तोडा है...

मगर मैं खुश हूँ....

राहें धुँधली सी हैं..
शामें मय में घुली सी हैं..
ये ज़िंदग़ी शूली सी है..


तेरी यादें अब भी आतीं..
हर लम्हा मुझको सतातीं..
तन्हाईयाँ मुझको रुलातीं..

मगर मैं खुश हूँ.....


अनवरत अब चल रहा हूँ..
जीते जी अब जल रहा हूँ..
अब वो नहीं,
जो कल रहा हूँ..

अब तो खुद से भागता हूँ..
नींद में भी जागता हूँ..
गम को मय से आंकता हूँ..
दर्द बन गयी है स्याही...

मगर मैं खुश हूँ...


दर-ब-दर अब घूमता हूँ...
खुद को अब मैं ढूँढता हूँ...


भीड़ में जाने कहाँ हूँ....


.....मगर......

मंगलवार, दिसंबर 06, 2011

गम-ए-इश्क

गम-ए-इश्क, वो हवा नहीं
जो छूकर,
 गुज़र जाये ....


नासूर है,

जो यादों की बयार में,
बार-बार ,
हरा हो जाये,,,,

बुधवार, नवंबर 30, 2011

तन्हाई


तन्हाई,
 आ तुझे गले लगा लूं..

तेरे आँचल में छुपकर,
एक सपना सजा लूं.,

सितारों की भीड़ में भटकते चाँद को 
हमसफ़र अपना बना लूं.....

बादलों की पनाह में, 
वो बैठे हों मेरे रूबरू,

होठों से छू कर
उस चाँद का 
शबनम चुरा लूं....

तन्हाई,
 आ तुझे गले लगा लूं....


दूरियां समेटकर 
उसे रूह में मिला लूं,

देखूं बस उसे
खुद को भुलाकर 

इस उम्मीद में 
कि,
छलके आँखों से मदिरा

दो घूँट पिऊ 
और 
जन्मों की प्यास बुझा लूं..

तन्हाई,
 आ तुझे गले लगा लूं..

एक पल के लिए

 जब जिंदगी की दौड़ में,
खुद से हार जाता हूँ...

बिछा जमीं की चादर,
आसमां ओढ़ सो जाता हूँ...

सबकी निगाहों से बचकर,
तेरी यादों की गलियों में जाता हूँ..

जो कभी हो ना सके अपने,
उन ख्वाबों को सजाता हूँ...

लफ्जों को लवों से छू कर,
एक गीत बनता हूँ....

जब कभी तन्हा होता हूँ,
उसे गुनगुनाता हूँ....

और फिर,
 एक पल के लिए,
जी जाता हूँ......

गुरुवार, नवंबर 24, 2011

क्षितिज़

तेरी कल्पनाओं के अतिरेक में,
नहाया हुआ,


चला जाता हूँ मीलों दूर बरबस.....






अनायास ही लेट जाता हूँ,
हरी चादरों पर,
शुन्य में ताकता हुआ,,




जब थक जाते हैं दृग,
हेरते हुए तुम्हें,




बेचैन हो,
उठ भागने लगता हूँ,


क्षितिज़ की ओर,




जहाँ खड़ी है तू,
मेरे इंतज़ार में...





बुधवार, नवंबर 23, 2011

संघर्ष

जिंदगी के उफनते सागर में,,,अभिलाषाओं की मजबूत नाव पर बैठा हूँ,,,

उस मजबूर नाविक की तरह,,जिसकी पतवार सागर की शक्तिशाली लहरों का सामना कर पाने में असमर्थ है,,

लेकिन फिर भी अनवरत पतवार चलाता जा रहा हूँ,,
इस उम्मीद में कि शायद,,,,,,इच्छाशक्ति चीर दे लहरों का सीना,,,,

और सरसराता हुआ पहुँच जाऊं,.,,

उस मंजिल पर ,,,,जो मुझे मेरी पहचान देने के लिए,,,

ना जाने कब से,,,

पलकें बिछाये बैठी है,,,,,

मंगलवार, नवंबर 15, 2011

मेरी मंजिल

पूरी दुनिया घूम आया...फिर भी ना खुद को पा सका....
दूर तक आँखें गयीं....पर मै वहां ना जा सका...                                             
दूर से देखा जिसे था....वो सुनेहरा ख्वाब था....
जिन्दगी की दौड़ में वो...जीत का आगाज़ था...

हर कदम पर खुश हुआ मै....जीत कर खुद से जहाँ...
ख्वाबों की दुनिया थी वो तो... खो गयी जाने कहाँ....

एक दिन अचानक ख्वाब टूटा...खो गया वो रास्ता ...
कल तलक जो हमसफ़र थे...टूटा उनसे वास्ता...

मै वहां से लौट आया...भूल कर खुद को वहीँ......
टूटे बिखरे ख्वाब थे बस...और बचा कुछ था नहीं...

खुद को ख्वाबों में था देखा...सोच में डूबा खड़ा....
उस जगह सौ रास्ते थे...उनमे मै उलझा पड़ा..

कोई तो एक रास्ता था....जो मुझे ले जाता वहां...
मेरी मंजिल मुझसे मिलने....बैठी थी कबसे जहाँ...
मेरी मंजिल.......... 

रविवार, नवंबर 06, 2011

sawalo ke ghere me team anna

महात्मा गाँधी के प्रतिरूप माने जाने वाले ७५ वर्षीय समाजसेवी अन्ना हजारे एवम उनकी टीम में फैली अस्थिरता भारतीय जन मानस पटल पर अंकित श्री अन्ना हजारे एवम उनके सहयोगियो की छवि को धूमिल करती नज़र आ रही है...अपने शुरुआती दौर में जिस टीम ने,ज़माने से शांत पड़े एक साधारण भारतीय के जेहन में जागरूकता एवम न्याय की लहर पैदा कर दी थी,वही टीम अन्ना आज अपने मुद्दे से भटकती नज़र आ रही है.......शायद टीम अन्ना समझ नहीं पा रही है कि रामलीला मैदान एवम देश के कोने कोने से मिला विशाल एवम अपार जन समर्थन श्री अन्ना एवम उनकी टीम को नहीं बल्कि उनके द्वारा उठाए गए मुद्दे में दिखे एक बेहतर कल के ख्वाब को मिला था ...देश की जनता ने गाँधीवादी टीम अन्ना को सिर आँखों पर बिठाया था ना कि विवादास्पद बयानबाजी करती किसी टीम को........वकील प्रशांत भूषण द्वारा कश्मीर के ऊपर की गयी टिपण्णी किसी भी दृष्टिकोण से टीम अन्ना के मुद्दों को समर्थन या मजबूत करती नज़र नहीं आती..उलटे गाँधीवादी छवि वाली टीम अन्ना के अहम् सदस्य कैमरे पर हाथापाई करते नज़र आते हैं.....वहीँ दूसरी तरफ देश की प्रथम महिला आइ.पी.एस. अधिकारी एवम टीम अन्ना की अहम् सदस्य श्रीमती किरण बेदी पर  किराये में हेरफेर के आरोप सिद्ध होते हैं...अपनी गलती स्वीकारने की बजाय किरण बेदी एवम उनके सहयोगी जनकल्याण की भावना का हवाला देते हुए,,उनके इस कुकर्म को सत्कर्म साबित करने की नाकाम कोशिश करते हैं......अरविन्द केजरीवाल देश भर में घूम घूमकर सरकार विरोधी भाषण दे रहे हैं..नागपुर में काले झंडे दिखाकर उनका विरोध किया जाता है ,,जिसके जवाब में केजरीवाल के समर्थक मारपीट पर उतारू हो जाते हैं..गौरतलब है कि पिछले दिनों उत्तर प्रदेश दौरे पर गए अरविन्द केजरीवाल पर जूता फेंका गया था..........वहीँ अन्ना के ब्लॉगर राजू परुलेकर के द्वारा अन्ना कि चिट्ठी प्रकाशित कि गयी..जिसमे टीम के सदस्यों के कारनामों से बोखलाए अन्ना ने अपने सहयोगियों को अलोकतांत्रिक एवम अवसरवादी तक कहा है..............ये सारी घटनाएँ जनता के विश्वास और समर्थन की कब्र खोद रहीं हैं .......अब तो अन्ना हजारे की नेतृत्व क्षमता  पर भी सवाल उठने लगे हैं....कुल मिलकर इस आन्दोलन की नैया किनारे पर डूबती नज़र आ रही है.....अन्ना के मौन  व्रत की समाप्ति पर देश को एक बेहतर एवम उम्दा मार्गदर्शन की आशा थी...परन्तु अन्ना जी पुराना राग अलापते ही नज़र आये...........अपील है मेरी अन्ना जी एवम उनकी टीम के सदस्यों से की जनता आपसे उम्मीद लगाये बैठी है,,,जनता के विश्वास को टूटने ना दे....जय हिंद 

ग़ज़ल बना रखा है..

आशियाना मेरे ख्वाबों का,,ठिकाना मेरे जज्बातों का,,सीने में बना रखा है,,ज़माने से छुपा रखा है ..................वक़्त की आंधी में उजड़े  ज़माने को,,सुकून के उस ठिकाने को,,निगाहों में छुपा रखा है,,खुद में बसा रखा है............हवाओं संग उड़ते बादलों को,,मुलाकातों की चादरों को,,अनकहे जज्बातों को,,फिजाओं में सजा रखा है,,खुश्बुओ में बसा रखा है................चाँद की पनाहों को,,खूबसूरत गुनाहों को,,लहरों सी उठती गिरती आहों को,,कशमकश की राहों को,,सलीके से सजा रखा है,,ज़हां बना रखा है.............................तेरी सदाओं को,,नजाकत भरी आदाओं को,,कभी उठती,,कभी गिरती निगाहों को ...................ग़ज़ल बना रखा है........लबों पे सजा रखा है...........

रविवार, अक्टूबर 02, 2011

ख्वाबों के जहाँ...

मुश्किल है जिंदगी  को समझ पाना........ 
बेतहाशा भागते रास्तों के संग, 
कदम से कदम मिलकर चल पाना....  

 मंज़िल नज़दीक दिखी चौक से, 
तो बेतहाशा भाग लिए.... 
थोड़ा आगे गए तो घबरा  गए... 
दुश्मन खड़े दिखे , 
रंजिशों  की आग लिए.....


मैं आगे बढ़ा,,,, 
उनसे पूछा..भाइयों मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है...... 
ख़ुदा के लिए परे हटो ,,,
 मुझे मंज़िल को पाना है...

ये रास्ते भागे जा रहे हैं...मुझे इनका साथ निभाना है...





दुश्मन बोले---

शोअख़ से जाओ ....हमें कोई गिला नहीं ......

लेकिन उस मंज़िल को पाने का रास्ता,

 कभी किसी को मिला नहीं............

घबड़ाकर  रास्तों की तरफ देखा...


वहां बस धूल के कारवाँ थे ....

बड़ा अफ़सोस हुआ जानकर कि हम बदगुमां थे.....


अब भी हम वहीँ हैं ..
पहले हम जहाँ थे ....


जिनके संग चले ,,,

वो बस ख्वाबों के जहाँ थे...




बस ख्वाबों के जहाँ ........

शनिवार, अक्टूबर 01, 2011

मानव होने का एहसास.....

कल एक माँ को देखा था...
अपने मैले-कुचैले आँचल में, अपने बच्चे को छिपाए...
दुखों की दास्ताँ पलकों में छुपाये......
चली जा रही थी सड़क के किनारे...

सूरज भी आग बरसा रहा था...
देखा था एक कौवे को,
  टोटी से टपकती बूंदों से अपनी प्यास बुझा रहा था...

शायद माँ भी प्यासी थी....


खोजती फिर रही थी, एक मुकम्मल छांव...
शायद जिसकी भागी थी....

उसे देख कर मैं सोच में पड़ गया...
अपने अन्दर बची मानवता को  खोजने लग गया.. .....

 जब अकेला बैठा तो न चाहते हुए भी सोच में पड़ गया...

मैं आज का यांत्रिक मानव,
 अपनी आत्मा से लड़ने लग गया..
 मेरी महानता का दंभ भरने लग गया .......

आज फिर मेरी आत्मा मुझे हरा रही थी,,...
टूटे आईने में ही सही...
पर इंसानियत का सच्चा चेहरा दिखा रही थी....

सिसकते देखा था,
 जिसे उस धुंधले आईने में...

वो तस्वीर,
 मुझे मेरे मानव होने का एहसास दिला रही थी....

 तस्वीर मुझे मेरे मानव होने का एहसास दिला रही थी....

सोमवार, सितंबर 26, 2011

Rishtey

वक़्त के साथ-साथ माता-पिता और बच्चों के संबंधों में बड़े बदलाव आये हैं....पाश्चात्य संस्कृति भारतीय सभ्यता और संस्कृति पर हावी होती जा रही है,,हम अपने मूल्यों को भुलाकर पश्चिमी सभ्यता को अपना रहे हैं....इसका असर हमारी वेश-भूषा के साथ-साथ हमारे संस्कारों पर भी पड़ा है...................मौजूदा वक़्त में वृद्धा आश्रमों की दिनोंदिन बढती संख्या हमारे समाज में घट रहे कटु सत्य का पर्दाफाश करती है.....पुराने ज़माने में माता-पिता को भगवान का दर्ज़ा दिया जाता था ,,,उनकी सेवा ही पूजा और पुण्य थे...इसी भारतीय भूमि पर श्रवण कुमार और राम जैसे मातृभक्त हुए थे....उनका त्याग और बलिदान महान था...लेकिन मौजूदा समय में हम अपने मूल्यों और संस्कारों को भूलते जा रहे हैं .....आये दिन माता-पिता से दुर्व्यवहार की ख़बरें आती रहती हैं.....आखिर हमारी इस मानसिक विकृति का मूल क्या है? हम क्यों भूल जाते है कि ये वही सज्जन हैं,जिन्होंने हमें जीवन दिया है,हमारी परवरिश की है,हमें ऊँगली पकड़ कर चलना सिखाया है.......................क्या सिर्फ बच्चे हीं जिम्मेदार है इसके लिए या फिर बदला सामाजिक ढांचा इसके मूल में है......देखा गया है की संयुक्त परिवार में पले-बड़े बच्चे सामाजिक जीवन को ज्यादा सफलतापूर्वक निभा पाते हैं,जबकि केंद्रीय परिवार के बच्चे सामाजिक जीवन के वास्विक रूप से अनजान होते हैं.....आज की .तेज़ रफ़्तार से भागती जिन्दगी में सफलता या साफ़ शब्दों में कहे तो आर्थिक सफलता सर्वोपरि हो गयी है.और इस होड़ में लोग आँखें मूंदे इस कदर भाग रहे है की उनके पास अपने परिवार और बच्चों के साथ घुलने-मिलने का वक़्त ही नहीं है...लोग परिवार की जिम्मेदारी को अब आर्थिक पैमाने से तोलने लगे हैं ....बच्चों की आर्थिक जरूरतों की पूर्ति मात्र ही माता-पिता की अपने बच्चों के प्रति जिम्मेवारी नहीं बल्कि उन्हें नैतिक एवं सामाजिक पहलुओ से रूबरू कराना भी उनके अविभावकों का ही कर्त्तव्य है..  आज के समाज में माता-पिता एवम बच्चों के बीच संवाद शुन्यता बढती जा रही है....जरूरत है सोचने की क्या हमारा समाज सचमुच विकास की राह पर है?कहीं  हमारा समाज मशीनी सभ्यता की तरफ तो नहीं बढ रहा? क्या हमारी संवेदना शिथिल हो रही है?क्या हम मानवता के मायने भूलते जा रहे हैं? हमें जरूरत है एक निये सिरे से सोचने की...ताकि हमारी मानवता बची रह सके.....                                                    

शुक्रवार, सितंबर 23, 2011

SHAYRI

दिल की आग,,,,तेरे मोहब्बत की शबनम से बुझाएंगे सनम,,,,,हमें लाख भुलाना चाहो ..पर हम तुम्हें याद आयेंगे सनम,,,तेरे गिले शिकवे का मुझे गम नहीं ,,,,तुमने दी जितनी भी मोहब्बत वो कम नहीं ,,,इस जनम नहीं तो अगले जनम में सही...पर एक दिन तुम्हें पाएंगे सनम .....,,,,दिल की तेरे मोहब्बत की शबनम से बुझाएंगे सनम....