ख्यालों के घनेरे कोहरों में खोये हुए
मैं और तुम..
रेत पर बूँद के निशां ढूंढ़ते
प्यासे भटकते मुसाफिरों की तरह,
जब मिल जाते हैं उस ठिकाने पर ....
जहाँ ..
खत्म हो जाते हैं
ज़माने के सारे गम..
जिंदगानी लगने लगती है
कमतर से भी कम....
तब..
खुद को खोकर
मैं और तुम..
कहलाने लग जाते हैं.
''हम'' ..









