रविवार, नवंबर 06, 2011

ग़ज़ल बना रखा है..

आशियाना मेरे ख्वाबों का,,ठिकाना मेरे जज्बातों का,,सीने में बना रखा है,,ज़माने से छुपा रखा है ..................वक़्त की आंधी में उजड़े  ज़माने को,,सुकून के उस ठिकाने को,,निगाहों में छुपा रखा है,,खुद में बसा रखा है............हवाओं संग उड़ते बादलों को,,मुलाकातों की चादरों को,,अनकहे जज्बातों को,,फिजाओं में सजा रखा है,,खुश्बुओ में बसा रखा है................चाँद की पनाहों को,,खूबसूरत गुनाहों को,,लहरों सी उठती गिरती आहों को,,कशमकश की राहों को,,सलीके से सजा रखा है,,ज़हां बना रखा है.............................तेरी सदाओं को,,नजाकत भरी आदाओं को,,कभी उठती,,कभी गिरती निगाहों को ...................ग़ज़ल बना रखा है........लबों पे सजा रखा है...........

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