रविवार, फ़रवरी 19, 2012

इश्क पिला गयी थी वो..

सर्दियों की धुंध भरी शामों में
  शराब में इश्क  घोलकर पिला गयी थी वो....




 नशे में डूबी, मेरी अधखुली निगाहों को
 आईना अक्स का अपने, बना गयी थी वो.... 




घुल गयी थी बनकर खुशबू,  हवाओं में
 हक़ मेरी सांसों पर जता गयी थी वो...





खुमारी है इश्क वो,  जो चढ़कर न उतरे
 अधरों से अधर लगा बता गयी थी वो.... 






सर्दियों की धुंध भरी शामों में 

शराब में इश्क घोलकर पिला गयी थी वो...
 

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