ऐ हमसफ़र,
चल दिए कहाँ ?
छोड़ के बीच सफ़र में...
अभी दूर है..
बसने चले थे हम,
जिस शहर में...
शायद, रेत की चादरों पर सजाये थे हमने सपने...
जिसे, वक़्त की आंधी ने उड़ा दिया...
राह में भटकते मुसाफिरों की तरह
तुने मुझे भुला दिया..
अकेले भटकते हैं अब,
अनजाने अंधेरे डगर में..
ऐ हमसफ़र,
चल दिए कहाँ ?
छोड़ के बीच सफ़र में...
तुझे खोकर,
खुद को ऐसे भुला दिया..
जैसे सीप से किसी ने
मोती चुरा लिया..
ऐसी क्या ख़ता हुई मुझसे,
बता,
क्यों बीच सफ़र में
तुने दामन छुड़ा लिया???
अपनी ही लाश ढोते है..
अपने कन्धों पर अब..
इस वीराने , अजनबी शहर में..
ऐ हमसफ़र,
चल दिए कहाँ ?
छोड़ के बीच सफ़र में...
अभी दूर है..
बसने चले थे हम,
जिस शहर में...

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