वक़्त के साथ-साथ माता-पिता और बच्चों के संबंधों में बड़े बदलाव आये हैं....पाश्चात्य संस्कृति भारतीय सभ्यता और संस्कृति पर हावी होती जा रही है,,हम अपने मूल्यों को भुलाकर पश्चिमी सभ्यता को अपना रहे हैं....इसका असर हमारी वेश-भूषा के साथ-साथ हमारे संस्कारों पर भी पड़ा है...................मौजूदा वक़्त में वृद्धा आश्रमों की दिनोंदिन बढती संख्या हमारे समाज में घट रहे कटु सत्य का पर्दाफाश करती है.....पुराने ज़माने में माता-पिता को भगवान का दर्ज़ा दिया जाता था ,,,उनकी सेवा ही पूजा और पुण्य थे...इसी भारतीय भूमि पर श्रवण कुमार और राम जैसे मातृभक्त हुए थे....उनका त्याग और बलिदान महान था...लेकिन मौजूदा समय में हम अपने मूल्यों और संस्कारों को भूलते जा रहे हैं .....आये दिन माता-पिता से दुर्व्यवहार की ख़बरें आती रहती हैं.....आखिर हमारी इस मानसिक विकृति का मूल क्या है? हम क्यों भूल जाते है कि ये वही सज्जन हैं,जिन्होंने हमें जीवन दिया है,हमारी परवरिश की है,हमें ऊँगली पकड़ कर चलना सिखाया है.......................क्या सिर्फ बच्चे हीं जिम्मेदार है इसके लिए या फिर बदला सामाजिक ढांचा इसके मूल में है......देखा गया है की संयुक्त परिवार में पले-बड़े बच्चे सामाजिक जीवन को ज्यादा सफलतापूर्वक निभा पाते हैं,जबकि केंद्रीय परिवार के बच्चे सामाजिक जीवन के वास्विक रूप से अनजान होते हैं.....आज की .तेज़ रफ़्तार से भागती जिन्दगी में सफलता या साफ़ शब्दों में कहे तो आर्थिक सफलता सर्वोपरि हो गयी है.और इस होड़ में लोग आँखें मूंदे इस कदर भाग रहे है की उनके पास अपने परिवार और बच्चों के साथ घुलने-मिलने का वक़्त ही नहीं है...लोग परिवार की जिम्मेदारी को अब आर्थिक पैमाने से तोलने लगे हैं ....बच्चों की आर्थिक जरूरतों की पूर्ति मात्र ही माता-पिता की अपने बच्चों के प्रति जिम्मेवारी नहीं बल्कि उन्हें नैतिक एवं सामाजिक पहलुओ से रूबरू कराना भी उनके अविभावकों का ही कर्त्तव्य है.. आज के समाज में माता-पिता एवम बच्चों के बीच संवाद शुन्यता बढती जा रही है....जरूरत है सोचने की क्या हमारा समाज सचमुच विकास की राह पर है?कहीं हमारा समाज मशीनी सभ्यता की तरफ तो नहीं बढ रहा? क्या हमारी संवेदना शिथिल हो रही है?क्या हम मानवता के मायने भूलते जा रहे हैं? हमें जरूरत है एक निये सिरे से सोचने की...ताकि हमारी मानवता बची रह सके.....
सोमवार, सितंबर 26, 2011
Rishtey
स्थान:new delhi,india
नई दिल्ली, दिल्ली, भारत
शुक्रवार, सितंबर 23, 2011
SHAYRI
दिल की आग,,,,तेरे मोहब्बत की शबनम से बुझाएंगे सनम,,,,,हमें लाख भुलाना चाहो ..पर हम तुम्हें याद आयेंगे सनम,,,तेरे गिले शिकवे का मुझे गम नहीं ,,,,तुमने दी जितनी भी मोहब्बत वो कम नहीं ,,,इस जनम नहीं तो अगले जनम में सही...पर एक दिन तुम्हें पाएंगे सनम .....,,,,दिल की तेरे मोहब्बत की शबनम से बुझाएंगे सनम....
स्थान:new delhi,india
नई दिल्ली, दिल्ली, भारत
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