ज़िंदग़ी थमी सी है..
ज़ज्बातों में कोई कमी सी है..
आँखों में जाने कैसी नमी सी है..
मगर मैं खुश हूँ....
अपनों ने मुँह मोड़ा है..
जिसने वादा किया साथ देने का
उसने बीच भंवर में छोड़ा है..
दिल के टुकड़े ने,
टुकड़ों में दिल को तोडा है...
मगर मैं खुश हूँ....
राहें धुँधली सी हैं..
शामें मय में घुली सी हैं..
ये ज़िंदग़ी शूली सी है..
तेरी यादें अब भी आतीं..
हर लम्हा मुझको सतातीं..
तन्हाईयाँ मुझको रुलातीं..
मगर मैं खुश हूँ.....
अनवरत अब चल रहा हूँ..
जीते जी अब जल रहा हूँ..
अब वो नहीं,
जो कल रहा हूँ..
अब तो खुद से भागता हूँ..
नींद में भी जागता हूँ..
गम को मय से आंकता हूँ..
दर्द बन गयी है स्याही...
मगर मैं खुश हूँ...
दर-ब-दर अब घूमता हूँ...
खुद को अब मैं ढूँढता हूँ...
भीड़ में जाने कहाँ हूँ....
.....मगर......

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