शुक्रवार, फ़रवरी 22, 2013

थपेड़े ज़िंदगी के
ठोकरें ज़माने कीं,
तोड़ क्या पातीं मुझे,

प्रबल
और प्रबल होता गया।

ठंडे पानी के छीटें
 साबित हुए सब ..

      शुक्रिया
मुझ सोये को जगाने के लिए।।।।।   "शिव"
 


मंगलवार, फ़रवरी 12, 2013

ध्वंस जरूरी है ..

ध्वंस जरूरी है ..


बंद करो खुद को छलना 
क्या ख़ाक इनमे ईश्वर रहते हैं 
ढाह क्यों नहीं देते 
इन तमाम ज्वालामुखियों को 
मंदिरों,मस्जिदों,गुरुद्वारों को 
लपटों के सिवा इन्होंने 
दिया ही क्या है तुम्हें ...


क्या फायदा 
कलमा,भजन,अरदास का 
गुरुग्रंथ,गीता,कुरान का 
छला जाता है मानव 
आड़ में जिसकी 
और 
धर्म की मौत मरती है मानवता 
रह जाता है जिन्दा 
केवल सिक्ख,हिन्दू,मुसलमान 
धर्मांध पशु मात्र 
बहता मानव रक्त भी 
हरा,भगवा,नीला दिखता है जिसे ...


ध्वंस जरूरी है 
मजहब की चिंगारी का 
अंतर में बैठे 
नमाज़ी,अरदासी,पुजारी का 
ताकि 
दिख सके ईश्वर 
इंसान में तुम्हें 
पूज सको सत्कर्म को 
फैला सको मानवधर्म 
और 
रह जाओ मात्र 
विशुद्ध मानव।।।।।     

                                शिवप्रिय आलोक 



शनिवार, फ़रवरी 09, 2013

दिल अरमानों का समंदर
जिस्म एक किनारा ...

लहरों की सरगोशी

दो भींगे बदन

चर्खाब तेरा लम्स

उठती गिरती साँसें

चंद कतरा रेत

रेत पर लिक्खा
      नाम

मेरा-तुम्हारा।।।।।    " शिव "

शुक्रवार, फ़रवरी 08, 2013

शोर बहुत है इस शहर में
मैं  सुकून ढुंढता फिरता हूँ ....

सुलगाकर दिल को
फुरकत की चिंगारी से,
यादों  के धुँए में
वस्ल की वो रात ढुंढता फिरता हूँ ....

गुजरे थे जो  आगोश में तेरी
लौटकर भूली राहों में
अब भी वो पहर  ढुंढता फिरता हूँ ..

शोर बहुत है इस शहर में
मैं  सुकून ढुंढता फिरता हूँ ...

जिक्र कर तेरा
रकीब,जलाते हैं दिल मेरा
रंज से लबरेज़ आँखों में
वो राहते-चश्म ढूंढ़ता फिरता हूँ ...


शोर बहुत है इस शहर में
मैं  सुकून ढुंढता फिरता हूँ ...


दरअसल,
"तुझे" ढुंढा करता हूँ ।।।।।     शिव