गुरुवार, अगस्त 01, 2013

जीवन अविरल धारा
मानव ठहरा एक तिनके सा,

पत्थर सा वक़्त अटल खड़ा
रुख मोड़े पल पल जीवन का….


पत्थर से टकराई धारा
तिनका जा पंहुचा जल तल में,
जो सोचे बैठा था तिनका
सब बदल गया बस पल भर में,

धारा गाये कलकल कलकल
कलकल में ही जीवन पलपल
सुख गीत कभी
दुःख गीत कभी
बस गीत को सुनते रहना है ,

तिनके की नियति बहना है
हर हाल में बहते रहना है। "शिव"  

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