सर्दियों की धुंध भरी शामों में
शराब में इश्क घोलकर पिला गयी थी वो....
शराब में इश्क घोलकर पिला गयी थी वो....
नशे में डूबी, मेरी अधखुली निगाहों को
आईना अक्स का अपने, बना गयी थी वो....
आईना अक्स का अपने, बना गयी थी वो....
घुल गयी थी बनकर खुशबू, हवाओं में
हक़ मेरी सांसों पर जता गयी थी वो...
हक़ मेरी सांसों पर जता गयी थी वो...
खुमारी है इश्क वो, जो चढ़कर न उतरे
अधरों से अधर लगा बता गयी थी वो....
अधरों से अधर लगा बता गयी थी वो....
सर्दियों की धुंध भरी शामों में
शराब में इश्क घोलकर पिला गयी थी वो...


