मंगलवार, नवंबर 15, 2011

मेरी मंजिल

पूरी दुनिया घूम आया...फिर भी ना खुद को पा सका....
दूर तक आँखें गयीं....पर मै वहां ना जा सका...                                             
दूर से देखा जिसे था....वो सुनेहरा ख्वाब था....
जिन्दगी की दौड़ में वो...जीत का आगाज़ था...

हर कदम पर खुश हुआ मै....जीत कर खुद से जहाँ...
ख्वाबों की दुनिया थी वो तो... खो गयी जाने कहाँ....

एक दिन अचानक ख्वाब टूटा...खो गया वो रास्ता ...
कल तलक जो हमसफ़र थे...टूटा उनसे वास्ता...

मै वहां से लौट आया...भूल कर खुद को वहीँ......
टूटे बिखरे ख्वाब थे बस...और बचा कुछ था नहीं...

खुद को ख्वाबों में था देखा...सोच में डूबा खड़ा....
उस जगह सौ रास्ते थे...उनमे मै उलझा पड़ा..

कोई तो एक रास्ता था....जो मुझे ले जाता वहां...
मेरी मंजिल मुझसे मिलने....बैठी थी कबसे जहाँ...
मेरी मंजिल.......... 

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