बुधवार, नवंबर 30, 2011

तन्हाई


तन्हाई,
 आ तुझे गले लगा लूं..

तेरे आँचल में छुपकर,
एक सपना सजा लूं.,

सितारों की भीड़ में भटकते चाँद को 
हमसफ़र अपना बना लूं.....

बादलों की पनाह में, 
वो बैठे हों मेरे रूबरू,

होठों से छू कर
उस चाँद का 
शबनम चुरा लूं....

तन्हाई,
 आ तुझे गले लगा लूं....


दूरियां समेटकर 
उसे रूह में मिला लूं,

देखूं बस उसे
खुद को भुलाकर 

इस उम्मीद में 
कि,
छलके आँखों से मदिरा

दो घूँट पिऊ 
और 
जन्मों की प्यास बुझा लूं..

तन्हाई,
 आ तुझे गले लगा लूं..

एक पल के लिए

 जब जिंदगी की दौड़ में,
खुद से हार जाता हूँ...

बिछा जमीं की चादर,
आसमां ओढ़ सो जाता हूँ...

सबकी निगाहों से बचकर,
तेरी यादों की गलियों में जाता हूँ..

जो कभी हो ना सके अपने,
उन ख्वाबों को सजाता हूँ...

लफ्जों को लवों से छू कर,
एक गीत बनता हूँ....

जब कभी तन्हा होता हूँ,
उसे गुनगुनाता हूँ....

और फिर,
 एक पल के लिए,
जी जाता हूँ......

गुरुवार, नवंबर 24, 2011

क्षितिज़

तेरी कल्पनाओं के अतिरेक में,
नहाया हुआ,


चला जाता हूँ मीलों दूर बरबस.....






अनायास ही लेट जाता हूँ,
हरी चादरों पर,
शुन्य में ताकता हुआ,,




जब थक जाते हैं दृग,
हेरते हुए तुम्हें,




बेचैन हो,
उठ भागने लगता हूँ,


क्षितिज़ की ओर,




जहाँ खड़ी है तू,
मेरे इंतज़ार में...





बुधवार, नवंबर 23, 2011

संघर्ष

जिंदगी के उफनते सागर में,,,अभिलाषाओं की मजबूत नाव पर बैठा हूँ,,,

उस मजबूर नाविक की तरह,,जिसकी पतवार सागर की शक्तिशाली लहरों का सामना कर पाने में असमर्थ है,,

लेकिन फिर भी अनवरत पतवार चलाता जा रहा हूँ,,
इस उम्मीद में कि शायद,,,,,,इच्छाशक्ति चीर दे लहरों का सीना,,,,

और सरसराता हुआ पहुँच जाऊं,.,,

उस मंजिल पर ,,,,जो मुझे मेरी पहचान देने के लिए,,,

ना जाने कब से,,,

पलकें बिछाये बैठी है,,,,,

मंगलवार, नवंबर 15, 2011

मेरी मंजिल

पूरी दुनिया घूम आया...फिर भी ना खुद को पा सका....
दूर तक आँखें गयीं....पर मै वहां ना जा सका...                                             
दूर से देखा जिसे था....वो सुनेहरा ख्वाब था....
जिन्दगी की दौड़ में वो...जीत का आगाज़ था...

हर कदम पर खुश हुआ मै....जीत कर खुद से जहाँ...
ख्वाबों की दुनिया थी वो तो... खो गयी जाने कहाँ....

एक दिन अचानक ख्वाब टूटा...खो गया वो रास्ता ...
कल तलक जो हमसफ़र थे...टूटा उनसे वास्ता...

मै वहां से लौट आया...भूल कर खुद को वहीँ......
टूटे बिखरे ख्वाब थे बस...और बचा कुछ था नहीं...

खुद को ख्वाबों में था देखा...सोच में डूबा खड़ा....
उस जगह सौ रास्ते थे...उनमे मै उलझा पड़ा..

कोई तो एक रास्ता था....जो मुझे ले जाता वहां...
मेरी मंजिल मुझसे मिलने....बैठी थी कबसे जहाँ...
मेरी मंजिल.......... 

रविवार, नवंबर 06, 2011

sawalo ke ghere me team anna

महात्मा गाँधी के प्रतिरूप माने जाने वाले ७५ वर्षीय समाजसेवी अन्ना हजारे एवम उनकी टीम में फैली अस्थिरता भारतीय जन मानस पटल पर अंकित श्री अन्ना हजारे एवम उनके सहयोगियो की छवि को धूमिल करती नज़र आ रही है...अपने शुरुआती दौर में जिस टीम ने,ज़माने से शांत पड़े एक साधारण भारतीय के जेहन में जागरूकता एवम न्याय की लहर पैदा कर दी थी,वही टीम अन्ना आज अपने मुद्दे से भटकती नज़र आ रही है.......शायद टीम अन्ना समझ नहीं पा रही है कि रामलीला मैदान एवम देश के कोने कोने से मिला विशाल एवम अपार जन समर्थन श्री अन्ना एवम उनकी टीम को नहीं बल्कि उनके द्वारा उठाए गए मुद्दे में दिखे एक बेहतर कल के ख्वाब को मिला था ...देश की जनता ने गाँधीवादी टीम अन्ना को सिर आँखों पर बिठाया था ना कि विवादास्पद बयानबाजी करती किसी टीम को........वकील प्रशांत भूषण द्वारा कश्मीर के ऊपर की गयी टिपण्णी किसी भी दृष्टिकोण से टीम अन्ना के मुद्दों को समर्थन या मजबूत करती नज़र नहीं आती..उलटे गाँधीवादी छवि वाली टीम अन्ना के अहम् सदस्य कैमरे पर हाथापाई करते नज़र आते हैं.....वहीँ दूसरी तरफ देश की प्रथम महिला आइ.पी.एस. अधिकारी एवम टीम अन्ना की अहम् सदस्य श्रीमती किरण बेदी पर  किराये में हेरफेर के आरोप सिद्ध होते हैं...अपनी गलती स्वीकारने की बजाय किरण बेदी एवम उनके सहयोगी जनकल्याण की भावना का हवाला देते हुए,,उनके इस कुकर्म को सत्कर्म साबित करने की नाकाम कोशिश करते हैं......अरविन्द केजरीवाल देश भर में घूम घूमकर सरकार विरोधी भाषण दे रहे हैं..नागपुर में काले झंडे दिखाकर उनका विरोध किया जाता है ,,जिसके जवाब में केजरीवाल के समर्थक मारपीट पर उतारू हो जाते हैं..गौरतलब है कि पिछले दिनों उत्तर प्रदेश दौरे पर गए अरविन्द केजरीवाल पर जूता फेंका गया था..........वहीँ अन्ना के ब्लॉगर राजू परुलेकर के द्वारा अन्ना कि चिट्ठी प्रकाशित कि गयी..जिसमे टीम के सदस्यों के कारनामों से बोखलाए अन्ना ने अपने सहयोगियों को अलोकतांत्रिक एवम अवसरवादी तक कहा है..............ये सारी घटनाएँ जनता के विश्वास और समर्थन की कब्र खोद रहीं हैं .......अब तो अन्ना हजारे की नेतृत्व क्षमता  पर भी सवाल उठने लगे हैं....कुल मिलकर इस आन्दोलन की नैया किनारे पर डूबती नज़र आ रही है.....अन्ना के मौन  व्रत की समाप्ति पर देश को एक बेहतर एवम उम्दा मार्गदर्शन की आशा थी...परन्तु अन्ना जी पुराना राग अलापते ही नज़र आये...........अपील है मेरी अन्ना जी एवम उनकी टीम के सदस्यों से की जनता आपसे उम्मीद लगाये बैठी है,,,जनता के विश्वास को टूटने ना दे....जय हिंद 

ग़ज़ल बना रखा है..

आशियाना मेरे ख्वाबों का,,ठिकाना मेरे जज्बातों का,,सीने में बना रखा है,,ज़माने से छुपा रखा है ..................वक़्त की आंधी में उजड़े  ज़माने को,,सुकून के उस ठिकाने को,,निगाहों में छुपा रखा है,,खुद में बसा रखा है............हवाओं संग उड़ते बादलों को,,मुलाकातों की चादरों को,,अनकहे जज्बातों को,,फिजाओं में सजा रखा है,,खुश्बुओ में बसा रखा है................चाँद की पनाहों को,,खूबसूरत गुनाहों को,,लहरों सी उठती गिरती आहों को,,कशमकश की राहों को,,सलीके से सजा रखा है,,ज़हां बना रखा है.............................तेरी सदाओं को,,नजाकत भरी आदाओं को,,कभी उठती,,कभी गिरती निगाहों को ...................ग़ज़ल बना रखा है........लबों पे सजा रखा है...........