शुक्रवार, फ़रवरी 08, 2013

शोर बहुत है इस शहर में
मैं  सुकून ढुंढता फिरता हूँ ....

सुलगाकर दिल को
फुरकत की चिंगारी से,
यादों  के धुँए में
वस्ल की वो रात ढुंढता फिरता हूँ ....

गुजरे थे जो  आगोश में तेरी
लौटकर भूली राहों में
अब भी वो पहर  ढुंढता फिरता हूँ ..

शोर बहुत है इस शहर में
मैं  सुकून ढुंढता फिरता हूँ ...

जिक्र कर तेरा
रकीब,जलाते हैं दिल मेरा
रंज से लबरेज़ आँखों में
वो राहते-चश्म ढूंढ़ता फिरता हूँ ...


शोर बहुत है इस शहर में
मैं  सुकून ढुंढता फिरता हूँ ...


दरअसल,
"तुझे" ढुंढा करता हूँ ।।।।।     शिव 

कोई टिप्पणी नहीं: