मंगलवार, फ़रवरी 12, 2013

ध्वंस जरूरी है ..

ध्वंस जरूरी है ..


बंद करो खुद को छलना 
क्या ख़ाक इनमे ईश्वर रहते हैं 
ढाह क्यों नहीं देते 
इन तमाम ज्वालामुखियों को 
मंदिरों,मस्जिदों,गुरुद्वारों को 
लपटों के सिवा इन्होंने 
दिया ही क्या है तुम्हें ...


क्या फायदा 
कलमा,भजन,अरदास का 
गुरुग्रंथ,गीता,कुरान का 
छला जाता है मानव 
आड़ में जिसकी 
और 
धर्म की मौत मरती है मानवता 
रह जाता है जिन्दा 
केवल सिक्ख,हिन्दू,मुसलमान 
धर्मांध पशु मात्र 
बहता मानव रक्त भी 
हरा,भगवा,नीला दिखता है जिसे ...


ध्वंस जरूरी है 
मजहब की चिंगारी का 
अंतर में बैठे 
नमाज़ी,अरदासी,पुजारी का 
ताकि 
दिख सके ईश्वर 
इंसान में तुम्हें 
पूज सको सत्कर्म को 
फैला सको मानवधर्म 
और 
रह जाओ मात्र 
विशुद्ध मानव।।।।।     

                                शिवप्रिय आलोक 



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