रविवार, अक्टूबर 02, 2011

ख्वाबों के जहाँ...

मुश्किल है जिंदगी  को समझ पाना........ 
बेतहाशा भागते रास्तों के संग, 
कदम से कदम मिलकर चल पाना....  

 मंज़िल नज़दीक दिखी चौक से, 
तो बेतहाशा भाग लिए.... 
थोड़ा आगे गए तो घबरा  गए... 
दुश्मन खड़े दिखे , 
रंजिशों  की आग लिए.....


मैं आगे बढ़ा,,,, 
उनसे पूछा..भाइयों मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है...... 
ख़ुदा के लिए परे हटो ,,,
 मुझे मंज़िल को पाना है...

ये रास्ते भागे जा रहे हैं...मुझे इनका साथ निभाना है...





दुश्मन बोले---

शोअख़ से जाओ ....हमें कोई गिला नहीं ......

लेकिन उस मंज़िल को पाने का रास्ता,

 कभी किसी को मिला नहीं............

घबड़ाकर  रास्तों की तरफ देखा...


वहां बस धूल के कारवाँ थे ....

बड़ा अफ़सोस हुआ जानकर कि हम बदगुमां थे.....


अब भी हम वहीँ हैं ..
पहले हम जहाँ थे ....


जिनके संग चले ,,,

वो बस ख्वाबों के जहाँ थे...




बस ख्वाबों के जहाँ ........