शनिवार, अक्टूबर 01, 2011

मानव होने का एहसास.....

कल एक माँ को देखा था...
अपने मैले-कुचैले आँचल में, अपने बच्चे को छिपाए...
दुखों की दास्ताँ पलकों में छुपाये......
चली जा रही थी सड़क के किनारे...

सूरज भी आग बरसा रहा था...
देखा था एक कौवे को,
  टोटी से टपकती बूंदों से अपनी प्यास बुझा रहा था...

शायद माँ भी प्यासी थी....


खोजती फिर रही थी, एक मुकम्मल छांव...
शायद जिसकी भागी थी....

उसे देख कर मैं सोच में पड़ गया...
अपने अन्दर बची मानवता को  खोजने लग गया.. .....

 जब अकेला बैठा तो न चाहते हुए भी सोच में पड़ गया...

मैं आज का यांत्रिक मानव,
 अपनी आत्मा से लड़ने लग गया..
 मेरी महानता का दंभ भरने लग गया .......

आज फिर मेरी आत्मा मुझे हरा रही थी,,...
टूटे आईने में ही सही...
पर इंसानियत का सच्चा चेहरा दिखा रही थी....

सिसकते देखा था,
 जिसे उस धुंधले आईने में...

वो तस्वीर,
 मुझे मेरे मानव होने का एहसास दिला रही थी....

 तस्वीर मुझे मेरे मानव होने का एहसास दिला रही थी....